बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान : लिंगानुपात पर पड़ने वाला समेकित प्रभाव (भारतीय आधुनिक काल के सापेक्ष)

प्रस्तावना एवं तात्पर्य

वर्तमान में बेटियों की स्थिति ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में भी अधिक अच्छी नहीं कही जा सकती है। बालिका शिक्षा की कमी, बाल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या और लैंगिक भेदभाव इत्यादि आज भी समाज में बड़े स्तर पर व्याप्त है। इन समस्याओं के समाधान हेतु कई सरकारी व गैर सरकारी प्रयास समय-समय पर होते रहे है परंतु बालिकाओं की सभी समस्याओं के निवारण हेतु एक योजना की नहीं वरन् एक अभियान की आवश्यकता अधिक रही है। इसमें आमजन को बेटियों के महत्व के प्रति, उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जा सके। बिना जागरूकता के कोई भी योजना प्रभावी नहीं हो सकती , यह तो तय है। ऐसे में बेटियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करना तथा सर्वश्रेष्ठ कला महाविद्यालय में अध्ययन के अवसर उपलब्ध कराना भी अत्यंत आवश्यक है।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान द्वारा यही प्रयास किया गया है। इसमें बालिकाओं की सभी समस्याओं के प्रति जागरूकता अभियान के साथ उनकी समस्याओं का समाधान हो । हमारा समाज इतना ज्यादा पुरूष प्रधान हो गया है कि आज देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा बेटी पैदा ही नहीं करना चाहता है। इसका नतीजा है कि हमारे देश में पुरूषों के मुकाबले स्त्रियों की संख्या घटती जा रही है। 0-6 साल की उम्र के बीच प्रति 1000 लड़को के अनुपात में लड़कियों की संख्या में वर्ष 1961 से लगातार गिरावट आ रही है। वर्ष 1991 में लड़कियों की संख्या जहाँ 927 थी वहीं 2001 में यह घटकर 933-935 हो गई और 2011 में 943 हो गई।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने घटते लिंगानुपात, कन्या भ्रूण हत्या को रोकना, बालिका शिक्षा को सुनिश्चित करने तथा महिला सशक्तिकरण को बढावा देने के उद्देश्य से 22 जनवरी 2015 को हरियाणा के पानीपत जिले में “बेटी बचाओ, बेटी पढाओ” योजना को एक राष्ट्रीय अभियान के माध्यम से शुभारम्भ किया।

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बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना के महत्वपूर्ण लक्ष्य

  • अधिकतम बेटियों की शिक्षा एवं भागीदारी सुनिश्चित करना।
  • लिंग के आधार पर लिंग चयनात्मक उन्मूलन को रोकना।
  • बेटियों की उत्तरजीविता और संरक्षण सुनिश्चित करना।
  • सरकार तथा शिक्षा का बेटियों के संबंध में सापेक्षित अध्ययन करना।
  • विधिवत संस्थाओ तथा नागरिकों के मध्य कार्यक्रम की तुलना।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का लिंगानुपात पर पड़ने वाले प्रभाव की समीक्षा

वर्ष 2014-15 में 1,000 बालकों पर बालिकाओं की संख्या 918 थी, जो कि 2019-20 में बढ़कर 934 हो गई है। लिंगानुपात सम्बन्ध में खराब स्थिति वाले हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश आदि में अच्छा सुधार आया है। हालांकि बिहार, कर्नाटक, केरल, ओडिशा, नगालैंड, त्रिपुरा, दादर नागर हवेली और लक्षद्वीप में लिंगानुपात गिरा है और स्थिति पहले से खराब हुई है। इसके अलावा बाकी राज्यों में बालिकाओं की संख्या में पहले से सुधार आया है। झारखंड और मिजोरम में स्थिति ठीक वैसी ही है जैसी 7-8 साल पहले थी। झारखंड में प्रति 1,000 बालकों पर बालिकाओं की संख्या 920 और मिजोरम में 971 है।

नीति आयोग की आकलन रिपोर्ट

नीति आयोग की आकलन रिपोर्ट भी मानती है कि यह योजना लैंगिक भेदभाव कम करने, लड़कियों को महत्व प्रदान करने और जन भागीदारी पैदा करने में कारगर रही है। इस योजना से लोगों में बेटियों को लेकर उच्च स्तरीय जागरूकता आई है। हरियाणा में 876 से बढ़कर 924, चंडीगढ़ में 874 से 935, उत्तर प्रदेश में 885 से 928, पंजाब में 892 से 920, हिमाचल प्रदेश में 897 से 933, राजस्थान में 929 से बढ़कर 948 हो गया। उपरोक्त के अलावा यह परिवर्तन निरंतर गतिशील हैं।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की महत्ता

  • इस योजना से लड़के और लड़कियों के बीच का भेदभाव कम हो रहा है।
  • इस योजना के तहत बेटियों को पढ़ाई के लिए आर्थिक सहायता मिल रही है।
  • इस योजना से बेटियों की शादी के लिए भी आर्थिक सहायता उपलब्ध होती है।
  • बेटियों के कन्या भ्रूण हत्या कम हो रही है।
  • बेटियों के प्रति समाज में अधिक सम्मान में वृद्धि हुई हैं।
  • ग्रामीण एवं शहरी स्तर पर महिला वर्ग में विभेद में गिरावट आयी।
  • योजना के कारण सरकार एवं जनता में समीपता का स्तर बढ़ा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना को सफलतापूर्वक लागू करने तथा लिंगानुपात में सुधार के लिए 5 राज्यों को सम्मानित भी किया गया था। जिनमें दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखण्ड, राजस्थान और उत्तर प्रदेश सम्मिलित थे। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (बीबीबीपी) योजना की सफलता काफी हद तक राज्य सरकारों, जिला प्रशासन और समुदाय के सदस्यों की सक्रिय भागीदारी पर निर्भर करती है।

एसआरबी आंकड़ों पर नवीनतम रिपोर्ट राष्ट्रीय स्तर पर एसआरबी में सुधार की प्रवृत्ति को दर्शाती है, लेकिन बेटियों के अधिकारों की अगर बात करें तो ये कहना काफी मुश्किल है कि इसमें कितना सुधार हो पाया है। सरकार जागरुकता अभियान चलाती है , योजनाओं को सफल बनाने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रम चलाए जाते हैं और प्रयास किए जाते हैं, लेकिन जब तक समाज से बेटों और बेटियों के बीच भेदभाव जैसी कुप्रथा का अंत नहीं हो पाएगा। बेटियों को समान दर्जा नहीं दिया जाएगा, तब तक किसी भी योजना को सफल कहना काफी हद तक गलत होगा।

बियानी गर्ल्स कॉलेज, जयपुर (राजस्थान) में “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” योजना के तहत बालिकाओं के लिए विशेष प्रयास

  • फीस में रियायत (शैक्षिक योग्यता के आधार पर)
  • अशैक्षिक गतिविधियों में अवसर मिलना (खेल-कूद प्रतियोग्यताओँ में, अन्य सामाजिक कार्यक्रमों इत्यादि)

निष्कर्ष

यह कहा जा सकता हैं कि वर्तमान समय में बेटो और बेटियों के मध्य पूर्व में होने वाले अंतर में निरंतर परिवर्तन अग्रसर हैं। राजस्थान राज्य में सीनियर सेकण्डरी स्तर पर बालिकाओ तथा बालको (राजकीय विद्यालयो में ) के मध्य लिंगानुपात अधिक रहा हैं, परन्तु अब निरंतर इस क्रम में विचलन विधमान हैं। न्यायसंगत स्थिति हेतु यह तय हैं कि न केवल सरकार बल्कि नागरिको के अपेक्षित सहयोग की अपरिहार्यता आवश्यक हैं।

बियानी गर्ल्स कॉलेज, जयपुर (राजस्थान) बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। यह संस्थान बेटियों को उच्च शिक्षा, कौशल विकास और आत्मनिर्भर बनने के अवसर प्रदान करता है।

अभियान से सम्बंधित प्रमुख प्रश्न

प्रश्न- बालिकाओं को क्यों बचाना चाहिए?
उत्तर- बालिका संसार रचियता तथा परिवार को बनाये रखने वाली हैं।

प्रश्न- बालिकाओं को शिक्षित करने के क्या लाभ हैं?
a. बालिका का भविष्य सुरक्षित रहता हैं।
b. समाज तथा परिवार में प्रतिष्ठा बनी रहती हैं।
c. समाज तथा परिवार में प्रतिष्ठा बनी रहती हैं।

प्रश्न- बियानी गर्ल्स कॉलेज, जयपुर में बालिकाओं को क्यों पढ़ाया जाए?
a. बालिकाओं के सम्पूर्ण विकास में सहायक हैं।
b. शैक्षिक फीस का उपयुक्त समायोजन हैं।
c. सरकारी एवं गैर – सरकारी नौकरियों में प्रवेश का जरिया हैं। यहा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाई जाती हैं।


लेखक:
डॉ.एस.बुन्देला
प्रोफेसर, सामाजिक विज्ञान विभाग
बियानी गर्ल्स कॉलेज,जयपुर

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