नारी जीवन की श्रेष्ठता

भारतीय समाज में जन्म से मृत्यु तक जितनी भी अवस्थाएं हैं सभी में स्त्री का पूजनीय व महत्वपूर्ण स्थान है। प्रतिवर्ष 8 मार्च को मनाए जाने वाले महिला दिवस का उद्देश्य भी महिलाओं की समाज में भूमिका व उनके स्थान को लेकर जागरूकता बढ़ाना है। हमारे यहां परिवार की धुरी स्त्री को ही कहा जाता है और देश की अर्थव्यवस्था व समाज संगठन में स्त्रियों की भागीदारी महत्वपूर्ण है।

अगर हम बात करें तो देश की एकमात्र शक्ति स्त्री है। इस देश का जो भी संगठित स्वरूप आज देखने में आ रहा है, वह स्त्री की वजह से है। क्योंकि परिवारों के मिलने से समाज बनता है और समाज के मिलने से देश बनता है। यदि परिवार सुसंस्कृत होगा तो देश भी व्यवस्थित होगा।

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आज हमें देखने को मिलता है कि पर्व-त्यौहार, शादी-विवाह, रीति-रिवाज आदि में स्त्री की भागीदारी पुरुषों की अपेक्षा अधिक होती है। यह भागीदारी सदियों से चली आ रही है। शहरों में जीवन और आर्थिक गतिविधियों के बदलते स्वरूप के कारण स्त्री-पुरुष भागीदारी में बदलाव आया है।

हमारे देश में स्त्री की प्रतिष्ठा वैदिक काल से ही दिखाई देती है। ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि स्त्रियों के बिना कोई भी मांगलिक कार्य पूर्ण नहीं होता।

इसका एक प्रमुख उदाहरण रामायण में मिलता है, जब भगवान श्री राम अश्वमेध यज्ञ करवा रहे थे और माता सीता अनुपस्थित थीं। तब उन्होंने माता सीता की स्वर्ण मूर्ति बनवाई और तभी यज्ञ संपन्न हो सका। इससे स्पष्ट होता है कि स्त्री का स्थान अनिवार्य है।

नारी को इस देश में माता के रूप में माना गया है। मां को नारी जीवन की सर्वोच्च और सार्थकता का प्रतीक माना जाता है। स्त्री ने हर रूप में—मां, बेटी, पत्नी और बहू—अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया है। वह हर दुख सहकर भी अपने दायित्व निभाती है।

वैदिक काल में स्त्रियों को सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। वे शिक्षा के क्षेत्र में भी आगे थीं और समाज के हर कार्य में सक्रिय भागीदारी निभाती थीं। उन्होंने कई ग्रंथों की रचना भी की।

परंतु समय के साथ स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन आता गया। किसी भी समाज की स्थिति का आकलन वहां की महिलाओं की स्थिति से किया जा सकता है। समय के साथ महिलाओं की स्थिति में गिरावट देखी गई, विशेष रूप से गरीब वर्ग की महिलाओं में।

समाज के निर्माण में महिलाओं की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी शरीर के लिए वायु, जल और भोजन। फिर भी प्राचीन से आधुनिक समाज तक महिलाओं को अपेक्षित सम्मान, सुविधाएं और अवसर नहीं मिल पाए हैं।

भारतीय संविधान ने स्त्री और पुरुष को समान अधिकार दिए हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि सामाजिक और विकास के स्तर पर महिलाएं अभी भी पीछे हैं।

आज भी महिलाओं के साथ अत्याचार की घटनाएं सामने आती हैं, जैसे दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा और अन्य अपराध। यह समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

संविधान में अनेक कानून होने के बावजूद इन समस्याओं का पूर्ण समाधान नहीं हो पाया है। इसलिए आवश्यक है कि हम एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहां महिलाओं को सम्मान और समान अवसर मिलें।


ब्लॉग लेखन :
डॉ. प्रियंका शर्मा
सहायक प्राध्यापक, शिक्षा विभाग
बियानी गर्ल्स बी.एड. कॉलेज, जयपुर