सामाजिक अधिगम में समाज की भूमिका: बाल विकास और शिक्षा पर प्रभाव

सामाजिक अधिगम: एक सामाजिक प्रक्रिया है। सामाजिक ज्ञान का अर्जन सामाजिक अन्तःक्रिया के सन्दर्भ में तथा इसके परिणामस्वरूप होता है। सामाजिक माध्यमों में अनेक अवसर आते हैं, जब बालक को किसी कार्य को करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है तथा किसी कार्य के लिए हतोत्साहित किया जाता है। इसी संदर्भ में अच्छे शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि वे शिक्षकों को इस प्रकार प्रशिक्षित करते हैं कि वे बालकों को सही दिशा में प्रेरित कर सकें। किसी भी बालक या छात्र को जब किसी कार्य के लिए प्रोत्साहित किया जाता है तो उसे आत्मगौरव तथा आत्मसम्मान का अनुभव होता है और वह उस प्रकार के कार्य को सम्मानित कार्य समझने लगता है। ऐसे कार्यों को बालक अपने जीवन में धारण कर लेते हैं तथा उनको अपने व्यक्तित्व का अंग बना लेते हैं। इसके विपरीत जिन कार्यों के लिए बालकों को हतोत्साहित किया जाता है उससे उनको आत्मग्लानि का अनुभव होता है और वे उन कार्यों को करने से बचने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार समाज की धारणाओं का बालक के सीखने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान होता है। अनेक प्रकार की सामाजिक घटनाएँ एवं प्रक्रियाएँ बालक की मनोदशा पर गहरा प्रभाव डालती हैं तथा बालक के सीखने की प्रक्रिया को निर्धारित करती हैं।

क्रो एवं क्रो (Crow and Crow) के अनुसार, ‘कोई समाज व्यर्थ में किसी बात की आशा नहीं कर सकता। यदि वह चाहता है कि उसके तरुण व्यक्ति अपने समुदाय की भली-भाँति सेवा करें, तो उसे उन सब शैक्षिक साधनों को जुटाना चाहिए जिनकी तरुण व्यक्तियों को व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से आवश्यकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि बालक के अधिगम् में समाज की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

बालक अपने प्रारभिक काल में उसी व्यक्ति से सहभागिता का आदान-प्रदान करता है। इसका उदाहरण हम भारत के परम्परागत परिवारों में देख सकते हैं। बालक/बालिका अपने दादा-दादी से अधिक प्यार करते हैं तथा अपनी इच्छाओं को उनके समक्ष ही प्रकट करते हैं तथा दादा-दादी की बातों को स्वेच्छा से स्वीकार कर लेते हैं, जबकि माता-पिता से उनका व्यवहार पृथक होता है और वह उनसे अपनी माँगों के लिए जिद भी करते हैं।

इससे स्पष्ट है कि बालकों के सीखने के सन्दर्भ में वयस्क व्यक्तियों को, अभिभावकों को एवं शिक्षकों को अपनी धारणाओं में निम्नलिखित परिवर्तन करना चाहिए-

  • बालक की जिज्ञासा एवं इच्छाओं की पूर्ति करते हुए उसका विश्वास जीतने का प्रयास करें।
  • सीखने की प्रक्रिया में बालक के तर्कों को भी स्वीकार किया जाए।
  • बालक के कार्यों में अपना सहयोग प्रदान करें तथा सहयोगी की भूमिका का प्रदर्शन करें।
  • बालक यदि खेल की विधि से अधिगम करना चाहता है तो उसे उसी विधि से सिखाएँ।
  • बालक के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को अपनाएं जिससे उसके बाल मन को ठेस न पहुँचे और वह एक योग्य नागरिक बन सके।

उपर्युक्त तथ्यों के विवेचन से स्पष्ट है कि बालकों के विकास एवं अधिगम में समाज सम्बन्धी धारणाओं को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता—

शिक्षा के अनौपचारिक साधन (Informal Means of Education)

बालक शिक्षा विभिन्न प्रकार के माध्यमों से प्राप्त कर सकता है। विद्यालय जाने से पूर्व उसका समस्त ज्ञान एवं बोध अनौपचारिक माध्यमों के द्वारा ही होता है। इन अनौपचारिक माध्यमों के अन्तर्गत टी.वी., रेडियो, विभिन्न प्रकार के इनडोर तथा आउटडोर गेम (खेल) आदि आते हैं। इन अनौपचारिक माध्यमों का बालक के विकास में बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है।

कक्षा का भौतिक वातावरण (Physical Environment of the Class)

कक्षा का भौतिक वातावरण विद्यार्थियों के अधिगम को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। भौतिक वातावरण के अन्तर्गत प्रकाश, वायु, कक्षा में छात्रों के बैठने का स्थान, फर्नीचर की स्थिति, विद्यालय के आस-पास का वातावरण आदि आते हैं। यदि ऐसी स्थिति विद्यालय तथा उसके आस-पास रहती है तो छात्रों का मन अधिगम में ठीक से नहीं लगता है और वे थोड़ी ही देर में थकान का अनुभव करने लगते हैं तथा इन सब बातों से उनके सीखने में बाधा उत्पन्न होती है।

परिवार का वातावरण (Family Environment)

बालक के अधिगम पर उसके परिवार के वातावरण का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। यदि परिवार का महौल अच्छा एवं सकारात्मक है तो उससे बालक का विकास एवं अधिगम की प्रक्रिया बहुत तीव्र हो जाती है। इसके विपरीत यदि परिवार का वातावरण कलह, लड़ाई-झगड़े वाला होता है तो ऐसे में बालक के मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। वे उदास, खिन्न और नकारात्मक हो जाते हैं, जिससे उनके अधिगम पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

वंशानुक्रम (Heredity)

वंशानुक्रम का बालक के अधिगम पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि वंशानुक्रम अच्छा है तो बालकों तथा व्यक्तियों में भी अच्छे गुणों का विकास होता है। बालक की 50% योग्यताएँ एवं क्षमताएँ उनके वंशानुक्रम की ही देन हैं। बालक को अपने पूर्वजों से जहाँ एक ओर जैविक वंशानुक्रम की जानकारी प्राप्त होती है, वहीं दूसरी ओर अपने पूर्वजों के सामाजिक वंशानुक्रम का भी ज्ञान होता है। इससे बालक को अपने पूर्वजों के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा मिलती है, जिसके प्रति उसके मन में विश्वास उत्पन्न होता है।

सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण (Social and Cultural Environment)

सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण का आशय व्यक्ति द्वारा निर्मित उन मान्यताओं, रीति-रिवाजों, आदर्शों, मूल्यों, नियमों, विचारों, विश्वासों एवं भौतिक वस्तुओं की पूर्णतः से है जो जीवन को चारों ओर से घेरे रहते हैं। इन समस्त नियमों एवं आदर्शों का बालक अपने आदर्शों के आधार पर ही संस्थागत शिक्षा प्रणाली की स्थापना करता है।

व्यक्तित्व का विकास (Personality Development)

सामाजिक, सांस्कृतिक वंशानुक्रम तथा वातावरण आदि के ज्ञान से बालक मानवीय मूल्यों के विकास में रुचि लेने लगता है। सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति आस्था बालक के सांवेगिक तथा सामाजिक विकास में विशेष योगदान देती है तथा सामाजिक व्यक्तित्व समाज के लिए उपयोगी सिद्ध होता है। ये समस्त तत्व समग्र रूप से बालक के व्यक्तित्व विकास में प्रभावशाली भूमिका निर्वाह करते हैं।


ब्लॉग लेखन :
डॉ. मीनाक्षी शर्मा
सहायक आचार्य, शिक्षा विभाग
बियानी गर्ल्स बी.एड. कॉलेज, जयपुर

Faculty Development Programme on Generative AI

In a significant step toward modernizing academic practices, a Faculty Development Programme (FDP) on “Effective Use of Generative AI in Teaching and Education” was successfully conducted on 14th September 2026.

What Skills are Important for B.Pharm and D.Pharm Students?

The most useful B.Pharm and D.Pharm skills are pharmaceutical knowledge, practical laboratory work, communication, analytical thinking, problem-solving, attention to detail, teamwork, time management, digital literacy, and professional ethics. Both courses